मेरे प्रभु तुम कभी कभी बहुत याद आते हो ,
तो बडे भले लगते हो ,लेकिन जब भी तुम याद आते हो तो मेरे
सुख में नही ,दुःख में नही ,ना मेरे शोक में ही ,
तुम सदा तुम्हारे सुख में ,दुःख में ,और तुम्हारे शोक में ही याद आते हो ,
जब तुम खुश होते हो तो उषा की तरह मुस्कुराते हो ,
और जब अधिक प्रसन्न होते हो तो गाते हुए पंछी तुम्हारे मुख का
चुम्बन कर चले जाते है ,तब तुम कितने भले लगते हो ,
जब तुम सहृदय होते हो तो वर्षा बनकर बरस पड़ते हो ,
और जब कुछ देते हो तो प्राणदान देते हो ,तब तुम्हारे प्रभुत्व के प्रतिबिम्ब
रूप में सुकुमार शिशु कितने सुंदर ,कितने प्यारे लगते है ,
प्रभु जब तुम क्रोधित होते हो तो पर्वत की तरह कठोर ,
रात की तरह भयानक और मृत्यु की तरह डरावने लगते हो ,
तुम्हे जब शोक होता है तो ,तुम्हारे आंसू ओस बनकर किसी अज्ञात प्रहर
में बरस पड़ते हो ,जब सारा विश्व सोता रहता है ,
प्रभु तुम चाँद से शांत और शीतल होकर कितना सुख पहुचाते हो
तुम्हारे झिलमिलाते हुए असंख्य नेत्र जब नभ से निरंतर निहारते रहते है
तो उनसे खेलने में उनके पीछे सुदूर तक भटकते रहने में
कितना आनंद आता है ,हे प्रभु वैसे तुम कभी कभी ही मिलते हो
लेकिन जब भी तुम्हे पा जाता हु ,समझ पता हु तो बयां नही कर सकता
कितना असीम सुख मिलता है ,,,,, (बाबूजी )
2 comments:
babuji ki kavita padhakar aseem sukh hua .
babuji ki kvita pdhvane ke liye dhnywad .
Shubkamnayen.
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