वैसे तो परमात्मा ने हम लोगो को कई गुणों से उपकृत किया और इस दुनिया में भेजा । उन गुणों का हम कितना उपयोग और दुरूपयोग करते है यह एक अलग परिचर्चा का विषय है । स्मृति अगर ईश्वर की एक बहुमूल्य देन है तो विस्मृति हर मायने में एक वरदान है । अगर परमात्मा सिर्फ़ स्मृति ही देता तो यह जगत अच्छा -भला चलता फिरता पागलखाना हो जाता ,हो सकता की हमारे दिमाग की नसे भी फट जाती । ईश्वर ने तो स्मृति और विस्मृति के बीच में एक बेहतरीन तरीके की सामंजस्यता निर्धारित कर रखी है उस उपरवाले की प्राकृतिक देन के साथ खिलवाड़ करना हमारी तासीर हो गई है । अमूमन हर हिन्दुस्तानी इस स्मृति और विस्मृति के झूले में झूलता रहता है ,और भावनाओ की डोर इसे कभी लंबा झुला तो कभी छोटा झुला ,झुलाती रहती है । स्मृति और विस्मृति का तो चोली -दामन का साथ है ,और हर आदमी इसे अपनी सहूलियत के हिसाब से वापरता है । जैसे लक्ष्मी और सरस्वती दोनों बहने है और दोनों का बैर है ,जहा लक्ष्मी ज्यादा वहा सरस्वती कम ,जहा सरस्वती की अधिकता वहा लक्ष्मी नदारद ?ऐसे ही कुछ -कुछ संतुलन का समीकरण स्मृति और विस्मृति के बीच में भी होता है । वैसे इन दोनों के बीच में "मच्योरेड_अंडरस्टेंडिंग "है दोनों समय-समय से अपना रुबाब दिखाती है । स्मृति की प्रकृति कुछ -कुछ लक्ष्मी जी जैसी है दोनों स्वभाव से चंचल है ,आज है कल कया भरोसा नही ,आती हुई अति सुंदर लगती है -जाती हुई एकदम कुरूप ,जरुरत से ज्यादा आ जाए तो मानसिक विकृति आती -और समय से पहले अगर चली जाए तो मानसिक असंतुलन पैदा करती है । दोनों चाहे जीतनी मात्रा में आ जाए आदमी को हमेशा कम ही लगती है । लक्ष्मी तो फ़िर भी {भले ही खोटी कमाई की हो} एक बार आपका साथ दे दे । मगर स्मृति का एन पर गायब हो जाना उसका चरित्र है । लोग -बाग़ इस स्मृति को बड़ा सहेज कर रखते है और भूल जाते ही की अच्छी अच्छी स्मृति वाले समय के साथ विस्मृति के शिकार हो जाते हैं । जब हम स्कूल कॉलेज में पढ़ते थे ,इस स्मृति ने हम सब को बहुत परेशां किया है,इसने हमे बहुत दुःख दिए हैं ,जो आज तलक विस्मृत नही हो पाए हैं । पूरी पूरी १५,१६ जमात की कितनी किताबे पढ़ डाली ,आगे पाठ, पीछे सपाट ,पूरे साल हर विषय की घुटाई की मगर कसम खाने को एक बार भी प्रथम श्रेणी नही आयी ,जब भी पाया परिणाम की सूचि में अपना नाम जनता श्रेणी में ही पाया गोया किसी ने जैसे हमारा सदा के लिए आरक्षण करवा रखा हो । जितनी किताबे पढ़ी ,आज कुछ भी याद नही मगर ये जनता श्रेणी भुलाये नही भुलाती ,किसको दोष दे ,आख़िर में ये ससुरी स्मृति ही ने हमारा कभी साथ नही दिया,स्मृति ने हमे क्या अच्छो -अच्छो को जिंदगी में धोका दिया हैं । इस छोटीसी जिंदगी में हमने प्रोफेसर को लेक्चर ,डॉक्टर को नुस्खा,वकील को अपना पॉइंट ,कवि को अपनी कविता ,गायक को अपना गीत ,और राजरोग से पीड़ित बीमार को अपनी जिंदगी ,को भूलते हुए देखा हैं । आपने शायद एक आम आदमी को अपनी दो जून रोटी के इंतजाम में इतना व्यस्त पाया हो की वह अपनी जिंदगी जीना ही भूल जाता हैं कई बार देखा होगा । आदमी जब स्मृति चाहता हैं ततो विस्मृति हावी होती हैं ,और जब किसी बात से विस्मृति चाहता हैं टों स्मृति हमारा पीछा नही छोड़ती हैं । जवानी में जब स्मृति की चाहत करता हैं तो विस्मृति दुःख देती हैं और बुढापे में जब आदमी सब कुछ विस्मृत करना चाहता हैं ततो स्मृति पटल पर सब घटनाएं ,दुर्घटनाए (जैसे शादी ) की फ़िल्म बार -बार याद आती हैं । जिन्दगी में प्यार तो कुछ ही लोग करते हैं ,मगर एकतरफा प्यार हर कोई करता ही हैं और ये एकतरफा प्यार बुढापे तक भी विस्मृत नही होता , रह रह कर पुरानी फाईले याद आती ही,और दिल से आह्ने निकलती हैं । स्मृति का ये एकमात्र इमानदारी का जीता जागता सबूत हैं । ऊपर वाले का खेल भी कुछ निराला हैं अगर ये आदमी का बच्चा इस दुनिया में जरुरत से ज्यादा टिक गया (याने आदमी ७० साल से ज्यादा )फ़िर वो अपना खेल दिखाता हैं ,विस्मृति के इतने बड़े बड़े झूले देता हैं की आदमी अपने वालो को ही पहचान ने से इनकार कर देता हैं ,हर एक मिनिट में स्मृति आती हैं ,हर दुसरे मिनिट में विस्मृति ,और हर तीसरे मिनिट में आदमी ये पूछता हैं की -आप कौन ,,,?,,,आदमी हैं की अपने भूतकाल में जीता हैं ,भविष्यकाल के लिए तिल -तिल होकर मरता हैं ,और वर्तमानकाल में वो सिर्फ़ स्मृति और विस्मृति के झूले -झूलता रहता हैं । डॉक्टर बाबु से अगर पूछो ,वो इसको "डिमेंशिया"कहता हैं और कहता ही की स्मृति और विस्मृति दोनों समानांतर रेखाए हैं जो जिंदगी में कभी नही मिलती एक दुसरे से ,सिर्फ़ जीवन की कुछ डायमंड क्रोसिंग (शादी ) होती हैं जो चाहकर भी स्मृति और विस्मृति के दायरे से बाहर होती हैं । आप सब अनुभवी लोग हैं हकीकत से वाकिफ हैं ,स्कूल में पढ़ा था की दिमाग के चार लोब होते हैं राइट लोब और लेफ्ट ,आज समझ में आया के लेफ्ट लोब में कुछ भी राइट नही हैं ,और राइट लोब में नथिंग इस लेफ्ट , सब कुछ खाली -खाली ,बस मस्त रहो ,झूले -झूलते रहो । ,,,,,,,,,,,,,,,
Tuesday, July 28, 2009
Sunday, July 26, 2009
अपने वाले
एक गाँव था, उस गाँव में एक बौड़म आदमी रहता था। चूँकि स्वभाव उसका बौड़म था, अत ;उसकी सोच -समझ कुछ हटकर थी और वैसा ही उसका व्यवहार भी था -उसने देखा लोग जो है, बहुत ही भक्ति -भाव से विभिन्न देवी देवताओ की आराधना करते है। मुझे भी कुछ करना है, समझ में नही आ रहा था की अब क्या करे जो सब करते है उनकी आराधना मैp नही करूँगा । बहूत सर खपाने के बाद बड़े मुश्किल से पकड़ में आया के सिर्फ़ एक ही भगवान् है जिसकी कोई भी पूजा पाठ ,तपस्स्या नही करता है ,वो है श्री यमराज। आनन फानन पूरण भक्ति भावः से बौड़म जी ने यमराज जी की आराधना शुरू कर दी ,कुछ ही दिनों में श्री यमराज को अपना सिहासन डोलता नज़र आया ..यमराज को चिंता हो गई की अपना कौन सा भक्त जमीं पर पैदा हो गया है. यमराज के शायद जीवन काल का पहला और आखिरी अनुभव रहा हो। तुंरत यमराज जी ने निर्णय लिया, भक्त की भक्ती पर अपनी संतुष्टि की मुहर लगाई और पहुच गए अपने भक्त को दर्शन देने । साक्षात् यमराज को अपने सामने खड़ा देख बौड़म जी को विश्वास नही हुआ कि इतनी कम भक्ति में अपना भगवन इतनी जल्दी प्रसन्न हो जाएगा।स्स्तिथि यह हो रही थी की भक्त और भगवान् दोनों एक दुसरे को शंका की नज़र से देख रहे थे । देवता यमराज को यह समझ में नही आ रहा था की इस बौड़म को तेतीस करोड़ देवी देवता कम पड़ गए , जो मेरी भक्ति कर रहा है / । और बौड़म सोच रहा था ये कैसा आसान किश्तों वाला भगवान् है जो इतनी आसानी से मेरे सामने हाज़िर हो गया । यमराज ने डरते हुए ,की कही यह मेरा सिहासन न मांग ले ,हिम्मत करके बोले भक्त क्या चाहिए हम तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हुए ? बौड़म ने सकपकाते हुए अपने भगवन से बोला की प्रभु कुछ ऐसी शक्ति दीजिये की ये जीवन बिना कुछ किए, ,धरे, शान से कट जाए, यमराज बोले तथास्तु और मन ही मन प्रसन्न हुए की ये भक्त तो अन्य संसारियों की तरह भ्रमित और दिशाहीन तपस्वी है। बौड़म ने प्रभु से पूछा की , तथास्तु को विस्तार से समझाए , यमराज जी बोले- भक्त , आज से तुम मुझे हमेशा अपनी आँखों से देख सकोगे बौड़म बोला -आपके रोज़ रोज़ दर्शन करके में क्या करूँगा ?यमराजजी बोले - भक्त मै तुम्हे ये शक्ति दे रहा हूँ की तुम मुझे किसी के सर तरफ खड़ा पाओगे तो समझ लेना मै उस को निश्चित ही यमलोक ले जाऊंगा और अगर मै पैरो की तरफ़ खड़ा हूँ तो समझ लेना उस व्यक्ति को छोड़ दूंगा इतना कहकर यमराजजी अंतर्धान हो गये अब बौड़म जी को काटो तो खून नही ,उनके कुछ भी समझ नही आ रहा था की अब क्या करे ?जैसे पहले थे वेसे ही जिंदगी कट रही थी ,धीरे धीरे गाँव में बाबा बौड़म जिसे कह देते की अब तुम्हारा समय आ गया है वो अगले ही दिन यमराज के हेड ऑफिस को रिपोर्ट कर देता।, औरअच्छे भले हुए सीरियस केस को कह देते जाओ यह बच जाएगा ,हमारी भभूत लगा देना । धीरे धीरे बाबा की शक्ति की चर्चा पुरे गाव में होने लगी ,धीरे धीरे शागिर्द भी बनने लगे । जब ज्यादा शागिर्द हो गए तो भक्त जनों ने आश्रम भी बना दिया । जिन्दगी बड़े आराम से गुजर रही थी । बाबा बौड़म दास और उनके शागिर्द भक्तो को भभूत, बाट दिल खोल कर आर्शीवाद देते । कभी कभी कुछ प्रवचन भी दे देते । बाबा की जिंदगी बड़े आराम से गुजर रही थी। । बाबा की प्रसिद्दि होने लगी जैसे जैसे बाबा का कद बढ़ता गया और शागिर्दों कि संख्या भी बढ़ती गई फ़िर । बाबा कि जिन्दगी बडे आराम से गुजर रही थी ,काम कोड़ी का नही और फुर्सत धेला भर कि नही ,थोडी सी भभूत पास में रख लेते और भक्तो को लगाते रहते थे दो चार चीजे याद कर ली थी वाही घुमा फिराकर सबको प्रवचन देते रहते कुछ साल ऐसे ही गुजर गये ।अचानक एक दिन बाबा बादाम का हलवा खाकर अपने लंबे चौड़े तखत पर सुबह सुबह सुस्ता रहे थे कि उनके अपने ईष्ट भगवान यमराज उनको अपने ही सिरहाने तरफ खडे हुए दिए। बाबा तखत पर एकदम जोर से उछले और दोनों हाथ जोड़ते हुए बोले प्रभु आज मेरे सिरहाने ?आपके इरादे तो नेक है ?यमराज बोले-भक्त आज तुम्हारी तारीख है आज तुम्हे संध्या की बेला में सूर्यास्त तक हमारे हेड आफिस रिपोर्ट करना है। बाबा ने जब ये बात सुनी तो बाबा को चार सो चालीस वाट का झटका लगा गिडगिडाते हुए बोला प्रभु में तो आपका भक्त हु । मुझे तो बख्शो ?यमराज बोले हमारे संविधान में किसी तरह का कोई संशोधन सम्भव नही है ।बाबा ठहरे बौड़म, आव देखा न ताव एक नजर भक्तो के द्वारा बनाये लंबे चौडे तख्त के और की, और पुरे ताकत से कुलाटी मारना शुरू कर दिया ।यमराज जैसे ही सर कि तरफ़ आते बाबा वैसे ही कुलाटी मार देते और उनके तरफ पैर कर देते ।यमराज बड़े परेशां ,बाबा का तखत पद्रह फिट लंबा चौडा बाबा की मर्जी का अखाडा, जिधर आई मर्जी उधर मारी कुलाटी , यमराज तखत के चारो तरफ दौड़ दौड़ कर पसीना -पसीना हो रहे थे, बाबा तो कभी चालीस की गति से तो कभी अस्सी की मद्धम गति तो कभी एक सो बीस की तेज गति से कुलाटी मार रहे थे। बाबा की कुलान्तिया की गति यमराज के दौड़ने की गति पर निर्भर थी कभी कभी दोनों कुछ पलविश्राम भी कर लेते थे .यमराज मन ही मन सोच रहे थे, की यह कैसा मेरा भक्त है, जो मेरी ही फजीहत करने पर तुला हुवा है । यह दो पाया आदमी का बच्चा , किसी भी हिसाब से विश्वास के लायक नही है ,इसको किसी जात का वरदान देना खतरे से खाली नही है ?उधर बाबा मन ही मन सोच रहे थे चाहे जो भी हो जाए आज मै यमराज के हाथ नही आउंगा, बड़े इफारात में वरदान बाटते रहते है ? बाबा के शागिर्द लोग आश्रम में तमाशा देख रहे थे, सुबह की, दोपहर हो गई , अब शाम होने वाली है, बाबा ने आज दिन भर से न कुछ खाया न कुछ पिया, ना दिन भर में किसी को भभूत दी ,न किसी को आपना घिसापीटा प्रवचन और सुबह से सिर्फ़ कुलाटी ही मारे जा रहे है। कोई भी शागिर्द पास आता तो चिल्लाकर भगा देते, बाबा तो आखिर मौत का भी नजदीक से आनंद ले रहे थे। अंततः उनके कुछ ख़ास शागिर्दों ने आपस में सलाह मशविरा किया की अगर वक्त रहते बाबा को नही संभाला तो बाबा के पागल हो जाने की संभावना है। अतः दो तीन शागिर्दों ने पैर पकडे और दो तीन शागिर्दों ने पुरा जोर लगाकर हाथ ,और बाबा की कुलाटी मारना बंद करवा दिया। बाबा जोर जोर से चिल्लाते रहे मगर शागिर्दों ने एक नही मानी, बाबा जितने जोर से चिल्लाते शागिर्द उतना ही जोर बढ़ा देते। उधर यमराज यह देखकर बड़े प्रसन्न हुए की आख़िर अब मेरी दौड़ ख़तम। यमराज ने अपना पसीना पोहचा और बाबा को ताना देते हुए कहा, बोल बेटा अब क्या कहना है तेरा ,बाबा दिल से बोला प्रभु ! ये तो मेरे अपने वाले शागिर्दों ने मरवा दिया नही तो में तुम्हारे हाथ कभी नही आता, इस दुनिया में यही मूल समस्या है के हमेशा 'अपने वाले' ही हमारी कबर खोदते है ।
Friday, July 24, 2009
जीवन स्पंदन
श्वांस का आना
श्वांस का जाना
क्या यही जीवन है ?
जीवन को जी लेना ,
जीवन की जिजीविषा को पी लेना ,
क्या यही जीवन
स्पन्दन है ?
दुखो का आना
आकर नही जाना,एवं
सुखो की तलाश में भटकते रहना
क्या यही जीवन
स्पन्दन है ?
जीवन के यथार्थ को झुठलाना
सपने जो अपने नही ,
उसमे अपने को भरमाना
क्या यही जीवन
स्पन्दन है ?
जीवन के हर पल को
भरपूर जिए
हाँ
यही जीवन
स्पन्दन है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
श्वांस का जाना
क्या यही जीवन है ?
जीवन को जी लेना ,
जीवन की जिजीविषा को पी लेना ,
क्या यही जीवन
स्पन्दन है ?
दुखो का आना
आकर नही जाना,एवं
सुखो की तलाश में भटकते रहना
क्या यही जीवन
स्पन्दन है ?
जीवन के यथार्थ को झुठलाना
सपने जो अपने नही ,
उसमे अपने को भरमाना
क्या यही जीवन
स्पन्दन है ?
जीवन के हर पल को
भरपूर जिए
हाँ
यही जीवन
स्पन्दन है ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
Monday, July 6, 2009
निमाड़ी बिदाई लोक गीत
फुलड़डा विनंती तू चली हो लड़क्ली
अपना पिताजी का बाघ म
कछु बिनीआ कछु बिनवा हो लागाया
इतरा म आया दुल्ल्हो रावोजी
उठो लड़कली तुम बठो पलखडी चलो ते अपना देश जी
जब हमरा पिताजी वर परख से तव जाई जावां तुम्हरा साथ जी
जव हमरा दादाजी दैजओ संजोव तवं जाईइ जवाँ तुम्हारा साथ जी
जव हमरी माय जो कूख पूऊजाव तव जाई जावा तुम्हरा साथ जी
जव हमरा भाई जो डोली संजोवा तव जाईइ जावा तुम्हरा साथ जी
काही ख प्आली रे बाबुल काहे ख पोसी काहे पिलायो काचो दूध जी
माया ख पलएई रे बाबुल माया ख पोसी ममता पिलायो काचो दूध जी
फूलडा ....................................
अपना पिताजी का बाघ म
कछु बिनीआ कछु बिनवा हो लागाया
इतरा म आया दुल्ल्हो रावोजी
उठो लड़कली तुम बठो पलखडी चलो ते अपना देश जी
जब हमरा पिताजी वर परख से तव जाई जावां तुम्हरा साथ जी
जव हमरा दादाजी दैजओ संजोव तवं जाईइ जवाँ तुम्हारा साथ जी
जव हमरी माय जो कूख पूऊजाव तव जाई जावा तुम्हरा साथ जी
जव हमरा भाई जो डोली संजोवा तव जाईइ जावा तुम्हरा साथ जी
काही ख प्आली रे बाबुल काहे ख पोसी काहे पिलायो काचो दूध जी
माया ख पलएई रे बाबुल माया ख पोसी ममता पिलायो काचो दूध जी
फूलडा ....................................
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