Tuesday, July 28, 2009

स्मृति-विस्मृति

वैसे तो परमात्मा ने हम लोगो को कई गुणों से उपकृत किया और इस दुनिया में भेजा । उन गुणों का हम कितना उपयोग और दुरूपयोग करते है यह एक अलग परिचर्चा का विषय है । स्मृति अगर ईश्वर की एक बहुमूल्य देन है तो विस्मृति हर मायने में एक वरदान है । अगर परमात्मा सिर्फ़ स्मृति ही देता तो यह जगत अच्छा -भला चलता फिरता पागलखाना हो जाता ,हो सकता की हमारे दिमाग की नसे भी फट जाती । ईश्वर ने तो स्मृति और विस्मृति के बीच में एक बेहतरीन तरीके की सामंजस्यता निर्धारित कर रखी है उस उपरवाले की प्राकृतिक देन के साथ खिलवाड़ करना हमारी तासीर हो गई है । अमूमन हर हिन्दुस्तानी इस स्मृति और विस्मृति के झूले में झूलता रहता है ,और भावनाओ की डोर इसे कभी लंबा झुला तो कभी छोटा झुला ,झुलाती रहती है । स्मृति और विस्मृति का तो चोली -दामन का साथ है ,और हर आदमी इसे अपनी सहूलियत के हिसाब से वापरता है । जैसे लक्ष्मी और सरस्वती दोनों बहने है और दोनों का बैर है ,जहा लक्ष्मी ज्यादा वहा सरस्वती कम ,जहा सरस्वती की अधिकता वहा लक्ष्मी नदारद ?ऐसे ही कुछ -कुछ संतुलन का समीकरण स्मृति और विस्मृति के बीच में भी होता है । वैसे इन दोनों के बीच में "मच्योरेड_अंडरस्टेंडिंग "है दोनों समय-समय से अपना रुबाब दिखाती है । स्मृति की प्रकृति कुछ -कुछ लक्ष्मी जी जैसी है दोनों स्वभाव से चंचल है ,आज है कल कया भरोसा नही ,आती हुई अति सुंदर लगती है -जाती हुई एकदम कुरूप ,जरुरत से ज्यादा आ जाए तो मानसिक विकृति आती -और समय से पहले अगर चली जाए तो मानसिक असंतुलन पैदा करती है । दोनों चाहे जीतनी मात्रा में आ जाए आदमी को हमेशा कम ही लगती है । लक्ष्मी तो फ़िर भी {भले ही खोटी कमाई की हो} एक बार आपका साथ दे दे । मगर स्मृति का एन पर गायब हो जाना उसका चरित्र है । लोग -बाग़ इस स्मृति को बड़ा सहेज कर रखते है और भूल जाते ही की अच्छी अच्छी स्मृति वाले समय के साथ विस्मृति के शिकार हो जाते हैं । जब हम स्कूल कॉलेज में पढ़ते थे ,इस स्मृति ने हम सब को बहुत परेशां किया है,इसने हमे बहुत दुःख दिए हैं ,जो आज तलक विस्मृत नही हो पाए हैं । पूरी पूरी १५,१६ जमात की कितनी किताबे पढ़ डाली ,आगे पाठ, पीछे सपाट ,पूरे साल हर विषय की घुटाई की मगर कसम खाने को एक बार भी प्रथम श्रेणी नही आयी ,जब भी पाया परिणाम की सूचि में अपना नाम जनता श्रेणी में ही पाया गोया किसी ने जैसे हमारा सदा के लिए आरक्षण करवा रखा हो । जितनी किताबे पढ़ी ,आज कुछ भी याद नही मगर ये जनता श्रेणी भुलाये नही भुलाती ,किसको दोष दे ,आख़िर में ये ससुरी स्मृति ही ने हमारा कभी साथ नही दिया,स्मृति ने हमे क्या अच्छो -अच्छो को जिंदगी में धोका दिया हैं । इस छोटीसी जिंदगी में हमने प्रोफेसर को लेक्चर ,डॉक्टर को नुस्खा,वकील को अपना पॉइंट ,कवि को अपनी कविता ,गायक को अपना गीत ,और राजरोग से पीड़ित बीमार को अपनी जिंदगी ,को भूलते हुए देखा हैं । आपने शायद एक आम आदमी को अपनी दो जून रोटी के इंतजाम में इतना व्यस्त पाया हो की वह अपनी जिंदगी जीना ही भूल जाता हैं कई बार देखा होगा । आदमी जब स्मृति चाहता हैं ततो विस्मृति हावी होती हैं ,और जब किसी बात से विस्मृति चाहता हैं टों स्मृति हमारा पीछा नही छोड़ती हैं । जवानी में जब स्मृति की चाहत करता हैं तो विस्मृति दुःख देती हैं और बुढापे में जब आदमी सब कुछ विस्मृत करना चाहता हैं ततो स्मृति पटल पर सब घटनाएं ,दुर्घटनाए (जैसे शादी ) की फ़िल्म बार -बार याद आती हैं । जिन्दगी में प्यार तो कुछ ही लोग करते हैं ,मगर एकतरफा प्यार हर कोई करता ही हैं और ये एकतरफा प्यार बुढापे तक भी विस्मृत नही होता , रह रह कर पुरानी फाईले याद आती ही,और दिल से आह्ने निकलती हैं । स्मृति का ये एकमात्र इमानदारी का जीता जागता सबूत हैं । ऊपर वाले का खेल भी कुछ निराला हैं अगर ये आदमी का बच्चा इस दुनिया में जरुरत से ज्यादा टिक गया (याने आदमी ७० साल से ज्यादा )फ़िर वो अपना खेल दिखाता हैं ,विस्मृति के इतने बड़े बड़े झूले देता हैं की आदमी अपने वालो को ही पहचान ने से इनकार कर देता हैं ,हर एक मिनिट में स्मृति आती हैं ,हर दुसरे मिनिट में विस्मृति ,और हर तीसरे मिनिट में आदमी ये पूछता हैं की -आप कौन ,,,?,,,आदमी हैं की अपने भूतकाल में जीता हैं ,भविष्यकाल के लिए तिल -तिल होकर मरता हैं ,और वर्तमानकाल में वो सिर्फ़ स्मृति और विस्मृति के झूले -झूलता रहता हैं । डॉक्टर बाबु से अगर पूछो ,वो इसको "डिमेंशिया"कहता हैं और कहता ही की स्मृति और विस्मृति दोनों समानांतर रेखाए हैं जो जिंदगी में कभी नही मिलती एक दुसरे से ,सिर्फ़ जीवन की कुछ डायमंड क्रोसिंग (शादी ) होती हैं जो चाहकर भी स्मृति और विस्मृति के दायरे से बाहर होती हैं । आप सब अनुभवी लोग हैं हकीकत से वाकिफ हैं ,स्कूल में पढ़ा था की दिमाग के चार लोब होते हैं राइट लोब और लेफ्ट ,आज समझ में आया के लेफ्ट लोब में कुछ भी राइट नही हैं ,और राइट लोब में नथिंग इस लेफ्ट , सब कुछ खाली -खाली ,बस मस्त रहो ,झूले -झूलते रहो । ,,,,,,,,,,,,,,,

2 comments:

ज्योति सिंह said...

smriti-vismriti ki bhinnta aur uski mahtta ko bahut hi khoobsurati ke saath darshaya hai .achchha laga ye lekh padhkar .

हिन्दीवाणी said...

बहुत सुदंर लेख मित्रवर।