Sunday, July 26, 2009

अपने वाले

एक गाँव था, उस गाँव में एक बौड़म आदमी रहता था। चूँकि स्वभाव उसका बौड़म था, अत ;उसकी सोच -समझ कुछ हटकर थी और वैसा ही उसका व्यवहार भी था -उसने देखा लोग जो है, बहुत ही भक्ति -भाव से विभिन्न देवी देवताओ की आराधना करते है। मुझे भी कुछ करना है, समझ में नही आ रहा था की अब क्या करे जो सब करते है उनकी आराधना मैp नही करूँगा । बहूत सर खपाने के बाद बड़े मुश्किल से पकड़ में आया के सिर्फ़ एक ही भगवान् है जिसकी कोई भी पूजा पाठ ,तपस्स्या नही करता है ,वो है श्री यमराज। आनन फानन पूरण भक्ति भावः से बौड़म जी ने यमराज जी की आराधना शुरू कर दी ,कुछ ही दिनों में श्री यमराज को अपना सिहासन डोलता नज़र आया ..यमराज को चिंता हो गई की अपना कौन सा भक्त जमीं पर पैदा हो गया है. यमराज के शायद जीवन काल का पहला और आखिरी अनुभव रहा हो। तुंरत यमराज जी ने निर्णय लिया, भक्त की भक्ती पर अपनी संतुष्टि की मुहर लगाई और पहुच गए अपने भक्त को दर्शन देने । साक्षात् यमराज को अपने सामने खड़ा देख बौड़म जी को विश्वास नही हुआ कि इतनी कम भक्ति में अपना भगवन इतनी जल्दी प्रसन्न हो जाएगा।स्स्तिथि यह हो रही थी की भक्त और भगवान् दोनों एक दुसरे को शंका की नज़र से देख रहे थे । देवता यमराज को यह समझ में नही आ रहा था की इस बौड़म को तेतीस करोड़ देवी देवता कम पड़ गए , जो मेरी भक्ति कर रहा है / । और बौड़म सोच रहा था ये कैसा आसान किश्तों वाला भगवान् है जो इतनी आसानी से मेरे सामने हाज़िर हो गया । यमराज ने डरते हुए ,की कही यह मेरा सिहासन न मांग ले ,हिम्मत करके बोले भक्त क्या चाहिए हम तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हुए ? बौड़म ने सकपकाते हुए अपने भगवन से बोला की प्रभु कुछ ऐसी शक्ति दीजिये की ये जीवन बिना कुछ किए, ,धरे, शान से कट जाए, यमराज बोले तथास्तु और मन ही मन प्रसन्न हुए की ये भक्त तो अन्य संसारियों की तरह भ्रमित और दिशाहीन तपस्वी है। बौड़म ने प्रभु से पूछा की , तथास्तु को विस्तार से समझाए , यमराज जी बोले- भक्त , आज से तुम मुझे हमेशा अपनी आँखों से देख सकोगे बौड़म बोला -आपके रोज़ रोज़ दर्शन करके में क्या करूँगा ?यमराजजी बोले - भक्त मै तुम्हे ये शक्ति दे रहा हूँ की तुम मुझे किसी के सर तरफ खड़ा पाओगे तो समझ लेना मै उस को निश्चित ही यमलोक ले जाऊंगा और अगर मै पैरो की तरफ़ खड़ा हूँ तो समझ लेना उस व्यक्ति को छोड़ दूंगा इतना कहकर यमराजजी अंतर्धान हो गये अब बौड़म जी को काटो तो खून नही ,उनके कुछ भी समझ नही आ रहा था की अब क्या करे ?जैसे पहले थे वेसे ही जिंदगी कट रही थी ,धीरे धीरे गाँव में बाबा बौड़म जिसे कह देते की अब तुम्हारा समय आ गया है वो अगले ही दिन यमराज के हेड ऑफिस को रिपोर्ट कर देता।, औरअच्छे भले हुए सीरियस केस को कह देते जाओ यह बच जाएगा ,हमारी भभूत लगा देना । धीरे धीरे बाबा की शक्ति की चर्चा पुरे गाव में होने लगी ,धीरे धीरे शागिर्द भी बनने लगे । जब ज्यादा शागिर्द हो गए तो भक्त जनों ने आश्रम भी बना दिया । जिन्दगी बड़े आराम से गुजर रही थी । बाबा बौड़म दास और उनके शागिर्द भक्तो को भभूत, बाट दिल खोल कर आर्शीवाद देते । कभी कभी कुछ प्रवचन भी दे देते । बाबा की जिंदगी बड़े आराम से गुजर रही थी। । बाबा की प्रसिद्दि होने लगी जैसे जैसे बाबा का कद बढ़ता गया और शागिर्दों कि संख्या भी बढ़ती गई फ़िर । बाबा कि जिन्दगी बडे आराम से गुजर रही थी ,काम कोड़ी का नही और फुर्सत धेला भर कि नही ,थोडी सी भभूत पास में रख लेते और भक्तो को लगाते रहते थे दो चार चीजे याद कर ली थी वाही घुमा फिराकर सबको प्रवचन देते रहते कुछ साल ऐसे ही गुजर गये ।अचानक एक दिन बाबा बादाम का हलवा खाकर अपने लंबे चौड़े तखत पर सुबह सुबह सुस्ता रहे थे कि उनके अपने ईष्ट भगवान यमराज उनको अपने ही सिरहाने तरफ खडे हुए दिए। बाबा तखत पर एकदम जोर से उछले और दोनों हाथ जोड़ते हुए बोले प्रभु आज मेरे सिरहाने ?आपके इरादे तो नेक है ?यमराज बोले-भक्त आज तुम्हारी तारीख है आज तुम्हे संध्या की बेला में सूर्यास्त तक हमारे हेड आफिस रिपोर्ट करना है। बाबा ने जब ये बात सुनी तो बाबा को चार सो चालीस वाट का झटका लगा गिडगिडाते हुए बोला प्रभु में तो आपका भक्त हु । मुझे तो बख्शो ?यमराज बोले हमारे संविधान में किसी तरह का कोई संशोधन सम्भव नही है ।बाबा ठहरे बौड़म, आव देखा न ताव एक नजर भक्तो के द्वारा बनाये लंबे चौडे तख्त के और की, और पुरे ताकत से कुलाटी मारना शुरू कर दिया ।यमराज जैसे ही सर कि तरफ़ आते बाबा वैसे ही कुलाटी मार देते और उनके तरफ पैर कर देते ।यमराज बड़े परेशां ,बाबा का तखत पद्रह फिट लंबा चौडा बाबा की मर्जी का अखाडा, जिधर आई मर्जी उधर मारी कुलाटी , यमराज तखत के चारो तरफ दौड़ दौड़ कर पसीना -पसीना हो रहे थे, बाबा तो कभी चालीस की गति से तो कभी अस्सी की मद्धम गति तो कभी एक सो बीस की तेज गति से कुलाटी मार रहे थे। बाबा की कुलान्तिया की गति यमराज के दौड़ने की गति पर निर्भर थी कभी कभी दोनों कुछ पलविश्राम भी कर लेते थे .यमराज मन ही मन सोच रहे थे, की यह कैसा मेरा भक्त है, जो मेरी ही फजीहत करने पर तुला हुवा है । यह दो पाया आदमी का बच्चा , किसी भी हिसाब से विश्वास के लायक नही है ,इसको किसी जात का वरदान देना खतरे से खाली नही है ?उधर बाबा मन ही मन सोच रहे थे चाहे जो भी हो जाए आज मै यमराज के हाथ नही आउंगा, बड़े इफारात में वरदान बाटते रहते है ? बाबा के शागिर्द लोग आश्रम में तमाशा देख रहे थे, सुबह की, दोपहर हो गई , अब शाम होने वाली है, बाबा ने आज दिन भर से न कुछ खाया न कुछ पिया, ना दिन भर में किसी को भभूत दी ,न किसी को आपना घिसापीटा प्रवचन और सुबह से सिर्फ़ कुलाटी ही मारे जा रहे है। कोई भी शागिर्द पास आता तो चिल्लाकर भगा देते, बाबा तो आखिर मौत का भी नजदीक से आनंद ले रहे थे। अंततः उनके कुछ ख़ास शागिर्दों ने आपस में सलाह मशविरा किया की अगर वक्त रहते बाबा को नही संभाला तो बाबा के पागल हो जाने की संभावना है। अतः दो तीन शागिर्दों ने पैर पकडे और दो तीन शागिर्दों ने पुरा जोर लगाकर हाथ ,और बाबा की कुलाटी मारना बंद करवा दिया। बाबा जोर जोर से चिल्लाते रहे मगर शागिर्दों ने एक नही मानी, बाबा जितने जोर से चिल्लाते शागिर्द उतना ही जोर बढ़ा देते। उधर यमराज यह देखकर बड़े प्रसन्न हुए की आख़िर अब मेरी दौड़ ख़तम। यमराज ने अपना पसीना पोहचा और बाबा को ताना देते हुए कहा, बोल बेटा अब क्या कहना है तेरा ,बाबा दिल से बोला प्रभु ! ये तो मेरे अपने वाले शागिर्दों ने मरवा दिया नही तो में तुम्हारे हाथ कभी नही आता, इस दुनिया में यही मूल समस्या है के हमेशा 'अपने वाले' ही हमारी कबर खोदते है ।

1 comment:

शोभना चौरे said...

vahji
bhut bdhiya vygy hai.steek.
badhai