मानव मात्र का ईष्ट एक ही है और वह है "आनंद ",हमारे बडे बडे ऋषि मुनियो ने भी यही लिखा है /"यायत जीवेत सुखम -जीवेत ऋण कृत्वा घृतं पिवेत " ऋषि मुनियों ने सुख की जगह दुःख क्यो नही लिखा ? क्योकि वे जानते थे मानव मात्र का ईष्ट सिर्फ़ आनंद है /जहा सत्य है वहा शिव है ,और शिव ही सुंदर है ,और जहा ये तीनो है वहा आनंद के अलावा और क्या हो सकता है ,अत; आनंद ही इश्वर है और इश्वर ही आनंद है /है कोई माई का लाल जो इस अकाट्य सत्य को चुनोती दे सके /इस संसार में हम सब क्यो आए है ?दुःख भोगने , बिल्कुल भी नही एक भी प्राणी इस बात को स्वीकार नही करेगा ,हम सब जीवन भर तलाशते है छोटे छोटे आनंद और तैयार करते है बडे बडे सुखो की फिक्स डिपोसिटये बडे बडे योगी हम सब छोटे छोटे सांसारिक भोगियों को जीवन के प्रति सारगर्भित प्रवचन देते है ,कहते है संसार और संसार के प्रति विषय आसक्ति अज्ञानता की सूचक है /
अरे बाबाजी ?
आदमी मिठाई की दूकान पर मिठाई खायगा की वहा खडे रहकर मखिया उडाएगाज्ञान की बात तो भोगने में ज्यादा अर्थपूर्ण लगती है ,और उसका त्याग या उस से विमुख होना ,ज्यादा निरर्थक लगता है और यही कारण है की आज ये बडे बडे योगी विलोपित हो रहे है ,और हम आलोकित हो रहे है ,कारण स्पष्ट हो रहा है ,की हमारा ईष्ट "आनंद "है /आवश्यकता आविष्कार की जननी है ,और आवश्यकता क्या है ,आवश्यकता आनंद की जननी है /संसार का यह एकमात्र स्थापित सत्य है की मानव मात्र शुरू से ही आनंद की खोज में रहा है, और एक आनंद के साथ ज्यादा समय व्यतीत नही कर सकता है ,दो पाया प्राणी है बोर हो जाता है /अत; फ़िर चल पड़ता है किसी नए आनंद की तलाश में ,,,मानव की यह अनंत यात्रा है जिस पर वह सालो साल से चल रहा है ,यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है की डार्विन नामक विज्ञानिक बहुत भोला होगा जिसने मानव विकास की थ्योरी लिख डाली .क्या ही अच्छा होता की आनंद के विकास पर वो कोई सिधांत प्रतिपादित करता
मानव मात्र पैदायशी ढोंगी है और जिंदगी भर एक पारंगत कलाकार की तरह से सबसे से ढोंग करता रहता है यहा तक की अपने आप से भी ढोंग करने में नही चूकता है ,और ऐसा करने में उसे असीम सुख और आनंद मिलता है कभी आधा तिलक तो कभी खड़ा तिलक ,भभूत ,ताबीज \कही चोटी तो कही दाढ़ी सबके सब सांकेतिक द्धोंगाचार है और इन सबके पीछे छुपा हुआ है एक विशिष्ट तरीके का आनंद ?यह एक सरासर सफेद झूठ है की कोई देवी देवता हमारा इष्ट है /हम तो उसके सामने भी ढोंग करने से बाज़ नही आते है हम सब मन्दिर जाते है और अपनी आखे बंद करके खडे हो जाते है ,क्यो ?अपने इष्ट से आखे मिलाकर बात करो पूछने पर सब कहते है ध्यान कर रहे है अपने इष्ट का ?अरे बाबा इष्ट तो सामने बैठा हुआ है अभी ध्यान की क्या जरुरत आन पड़ी ,ध्यान ही करना था तो घर पर ही कर लेते मन्दिर आने की क्या जरूरत थी /अब सारे खटकरम तो स्वयम को मालूम क्या खाकर अपने इष्ट से आखे मिलाकर बात करेगा /इस सबके पीछे भी अपना एक विशिष्ट "आनंद ''छुपा हुआ है जो हम सब बगैर नागा मजे लेते है / वैसे परमात्मा ने जिन्दगी का फार्मूला फोर्टी फौर सब के लिए एक जैसा ही बनाया है ,और उसमे बराबर -मात्र में जो तत्त्व डाले है वो है प्रेम, नफरत ,त्याग ,स्वार्थ ,प्रभुत्व ,समर्पण ,/ मगर यह प्राणियों की फड़कती हुई बुधिमत्ता का प्रमाण है की उसने अपने -अपने आनंद के हिसाब से इन तत्वों की मात्राओ में संसोधन कर डाला है /अब जिसको जो तत्त्व अच्छा लगा उसने उस व्यक्ति -विशेष में अपने गुण ,या अवगुण उसकी प्रभुता अपने दैनिक व्यवहार में नज़र आती है /अब किसीको अपना प्रभुत्व जमाने में ही आनंद आए तो क्या करे .,परमात्मा अपना फार्मूला तो बदलने से रहे ,आख़िर परमात्मा भी हार मानता है ,मानव मात्र के ईष्ट "आनंद " से /यह संसार विचित्रताओं से भरा पडा है ,तरह -तरह के प्राणी अपने अपने आनंद की मस्ती में अपनी -अपनी जिन्दगी का निर्वाह करते है / " क्षणे -रुष्टा ,क्षणे तरश्ता ,रुष्टा -तरश्ता क्षणे -क्षणे "अब ऐसे प्राणी की विचित्र प्रकृति का कोई इलाज ही नही है ,पर उसको ऐसे ही रहने में आनंद आता है ,तो कोई क्या करे ? आख़िर उसका ईष्ट भी तो आनंद ही है /
जिन्दगी का सबसे बडा रोग -क्या कहेंगे लोग ?,,,कुछ लोग इसीमे भ्रमित रहते है ,और दुनिया को कोसते रहते है ,क्या करे उनका आनंद भी इसीमे है ,/सब अपने ईष्ट के प्रति समर्पित भक्त है ,मुस्त है अपनी -अपनी मस्ती में , परमात्मा भी उसी प्राणी से प्रसन्न है जिसने अपनी जिन्दगी में आनंद का मार्ग प्रशस्त किया है ,और साथ वालो को भी उसी मार्ग पर खिचता है /,,,, ,,, जो हमेशा रोते ही रहते है ,वो क्या खाक जीते है ???